दिन के पहले सत्र, ‘आगे बढ़ता भारत : सभ्यता, ज्ञान और भविष्य के मार्ग’ (इंडिया ऑन द मूव : सिविलाइज़ेशन, नॉलेज एंड फ्यूचर पाथवेज़) में भारतीय सभ्यता के महत्व पर चर्चा की गई, जो अपनी गहरी सांस्कृतिक निरंतरता, विविधता और ज्ञान प्रणालियों के लिए जानी जाती है। इस चर्चा में वेदों, योग और ध्यान के वैश्विक प्रभाव को रेखांकित किया गया, जो भारत की शाश्वत सांस्कृतिक बुद्धिमत्ता के प्रतिबिंब हैं। इस सत्र में श्री अनंत विजय और श्री एंड्रेस बैरागान शामिल हुए। इसकी अध्यक्षता प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे ने की।
‘सतत प्रकाशन : चुनौतियाँ और अवसर’ (सस्टेनिबल पब्लिशिंग : चैलेंजेज़ एंड ऑपोर्चुनिटीज़) सत्र में श्री रामानंद पांडे और श्री एलेक्स सिएरा मोनकाडा एक साथ आए, जिन्होंने भारत में प्रकाशन को बनाए रखने के लिए मज़बूत कॉपीराइट ढाँचों की ज़रूरत पर बात की। कोलंबियाई दृष्टिकोण ने प्रकाशन पारिस्थितिकी तंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए डिजिटल और प्रिंट प्रारूपों के बीच संतुलन बनाने के महत्व पर बल दिया। चर्चा में यह भी बताया गया कि कैसे तकनीकी प्रगति ज्ञान के उत्पादन को लगातार नया रूप दे रही है और उसका विस्तार कर रही है।
‘डिजिटल युग में साहित्य से क्या उम्मीद करें’ (व्हाट टु एक्सपेक्ट फ्रॉम लिटरेचर इन द डिजिटल टाइम्स) विषय पर बोलते हुए, श्री कुमार विक्रम ने इस बात पर विचार किया कि कैसे डिजिटल मंच ने प्रकाशन प्रक्रियाओं को गति दी है और ज्ञान तथा जानकारी तक पहुँच को बेहतर बनाया है। साथ ही, उन्होंने भौतिक पुस्तकों की निरंतर प्रासंगिकता पर भी बल दिया। यह टिप्पणी की कि एआई मानवीय अनुभव की जगह नहीं ले सकता, क्योंकि “जब हम लिखते हैं, तो हम अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हैं।” इस सत्र का परिचय सुश्री लॉरा नतालिया रीना गोमेज़ ने दिया।
‘21वीं सदी में प्रकाशन : बाज़ार, पहुँच और वैश्विक जुड़ाव’ (पब्लिशिंग इन ट्वेंटीफस्ट सेंचुरी: मार्केट्स, एक्सेस एंड ग्लोबल कनेक्शंस) सत्र में श्री रामानंद पांडे और श्री फेलिप गोंज़ालेज़ शामिल हुए, और श्री कुमार विक्रम ने इसका संचालन किया। चर्चा में यह बात सामने आई कि भारत का प्रकाशन उद्योग मुख्य रूप से प्रिंट-आधारित है, जिसमें 80 प्रतिशत से अधिक सामग्री भौतिक रूप में होती है। इसी वजह से यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रकाशन बाजार बन गया है। इसके विपरीत, लैटिन अमेरिका को भौगोलिक और सीमा संबंधी बाधाओं के कारण वितरण में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे स्पेनिश पुस्तकों की तुलना में क्षेत्रीय प्रकाशनों का प्रसार सीमित हो जाता है। हालाँकि डिजिटल प्रकाशन का विस्तार हो रहा है, लेकिन इसने पुस्तक विक्रेताओं की भूमिका की जगह नहीं ली है। साथ ही, प्रकाशन गृहों का विस्तार भाषाई विविधता को समर्थन और बनाए रखने का काम जारी रखे हुए है।
‘मानव या मशीन : एआई के दौर में रचनात्मकता पर पुनर्विचार’ (ह्युमेन ओर मशीन: रीथिंकिंग क्रिएटिविटी इन द एज ऑफ एआई) शीर्षक वाले एक अन्य सत्र में, पैनलिस्ट सुश्री पाओला हुन और श्री मिगुएल कॉर्डोबा ने मॉडरेटर श्री बिस्वदीप चक्रवर्ती के साथ मिलकर, जटिल रचनात्मक कार्यों जैसे उपन्यास लिखना, कंटेंट एडिट करना और विज़ुअल डिज़ाइन बनाना, में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की अहम भूमिका पर चर्चा की। एआई और इंसान, दोनों ही समय के साथ एक ही सवाल के अलग-अलग जवाब देते हैं; यह सोच और संदर्भ की गतिशील प्रकृति को दर्शाता है। आखिरकार, रचनात्मकता की शुरुआत इंसानों से ही होती है और यह उस तरीके से आगे बढ़ती है जिस तरह हम एआई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं। इस सत्र में इस बात पर बल दिया गया कि हमें अपनी व्यक्तिगत आवाज को बनाए रखना चाहिए, अपनी अभिव्यक्ति की गहराई को बरकरार रखना चाहिए, और इंसानी मौलिकता को उन सामान्य पैटर्न से अलग पहचानना चाहिए जो अक्सर एआई द्वारा तैयार किए जाते हैं।
‘बच्चे, कल्पनाशीलता और पढ़ने की आदत का पोषण’ (चिल्ड्रन, इमेजिनेशन एंड नर्चरिंग रीडिंग हैबिट्स) सत्र में, सुश्री नीतू शर्मा, श्री एंड्रेस बैरागान और सुश्री आइरीन वास्को ने बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के तरीकों पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि परिवार के भीतर पढ़ने की आदत को एक संस्कृति के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जहाँ माता-पिता बच्चों के साथ मिलकर पढ़ने के अनुभवों के माध्यम से जुड़ें। एक सहायक वातावरण बनाने में माता-पिता और शिक्षकों को मुख्य सूत्रधार के रूप में पहचाना गया। चर्चा में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि कहानी सुनाना किस तरह कल्पना शक्ति को बढ़ावा देता है और पढ़ने के प्रति जुड़ाव को गहरा करता है, क्योंकि हर शब्द बच्चों को अपनी खुद की काल्पनिक दुनिया बनाने में मदद करता है। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि जहाँ एक ओर एआई की अनदेखी नहीं की जा सकती, वहीं दूसरी ओर इसका उपयोग सार्थक तरीके से किया जाना चाहिए।
कोलंबिया में भारत के माननीय राजदूत, महामहिम वनलालहुमा द्वारा ‘विकसित भारत @2047 का विज़न’ विषय पर एक वार्ता भी आयोजित की गई। अपनी वार्ता में, महामहिम ने भारत सरकार के उस विज़न के बारे में बात की, जिसके तहत 2047 तक राष्ट्र को एक विकसित, आत्मनिर्भर और विश्व-अग्रणी देश में बदलने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने देश के इस विज़न को सुदृढ़ बनाने के लिए अन्य देशों के साथ संबंध बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया, क्योंकि किसी भी देश का विकास परस्पर-निर्भर होता है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के अध्यक्ष प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे ने उन चार प्रमुख स्तंभों— युवा, गरीब, महिलाएँ और किसान पर प्रकाश डाला, जिन पर ‘विकसित भारत’ का विज़न आधारित है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय में उप सचिव श्री श्रेयांश मोहन द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। सत्र का संचालन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के मुख्य संपादक एवं संयुक्त निदेशक श्री कुमार विक्रम ने किया।
इस सांस्कृतिक संध्या में सुश्री एना वेलेज़ द्वारा ओडिसी और सुश्री एरिका डेडरले द्वारा कथक नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिससे दर्शकों को भारत की शास्त्रीय नृत्य परंपराओं की एक झलक देखने को मिली। दिन का समापन ‘दंगल’ और ‘जब वी मेट’ फिल्मों के प्रदर्शन के साथ हुआ, जिन्हें स्पेनिश सबटाइटल के साथ दिखाया गया।
भारत पवेलियन के ‘किड्स ज़ोन’ में बच्चों का तांता लगा रहा, जो अपने माता-पिता और शिक्षकों के साथ आए थे। दिन की शुरुआत “भारत को जानें” (नो इंडिया) क्विज़ से हुई, जिसे निजू दुबे ने संचालित किया और प्रतिमा एम ने उनकी सहायता की; ये दोनों ही भारतीय प्रतिनिधिमंडल और राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान, अहमदाबाद से हैं। भारत की विरासत से जुड़े ऑडियो-विज़ुअल सवाल बच्चों को खूब भाये, और विजेताओं को उपहार भी दिए गए। आइरीन वास्को के कहानी सुनाने के सत्र ने भारत और कोलंबिया की कहानियों के द्वारा दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। लोगों की जबरदस्त प्रतिक्रिया को देखते हुए, ये दोनों ही कार्यक्रम दिन में दो बार आयोजित किए गए।